छत्तीसगढ़

पीड़िता की जाति और कपड़े पर टिप्पणी करने वाले जज का हुआ था ट्रांसफर, अब केरल हाई कोर्ट ने लगाई रोक

नईदिल्ली I केरल हाई कोर्ट ने उस सेशन जज के ट्रांसफर पर रोक लगा दी है जिन्होंने यौन उत्पीड़न मामलों में पीड़िता की जाति और कपड़े पर विवादित टिप्पणी की थी. जज ने एक मामले में पीड़िता के कपड़े को ‘उकसावे वाला कपड़े’ बताया था. जज ने एक अन्य मामले में पीड़िता की जाति पर विवादित टिप्पणी की थी और आरोपी के बारे में कहा था कि “ऐसा असंभव है कि उन्होंने पीड़िता का यौन उत्पीड़न करने की कोशिश की होगी.” इसके बाद जज का 300 किलोमीटर दूर कोल्लम श्रम न्यायलय में ट्रांसफर कर दिया गया था.

विवादित टिप्पणी करने वाले जज एस कृष्णकुमार ने केरल हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच के सामने एक अपील दायर की थी, जिसमें उन्होंने दलील दी थी कि उनका ट्रांसफर एक दंडात्मक कार्रवाई है जो न्यायिक अधिकारियों के मनोबल को प्रभावित करेगी, जो उन्हें स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्णय लेने से रोकेगी. हालांकि जस्टिस एके जयशंकरन नांबियार और जस्टिस मोहम्मद नियास की बेंच ने पहले जज की याचिका को खारिज कर दिया था.

पीड़िता की जाति पर टिप्पणी से हुआ विवाद

यौन उत्पीड़न के दो अलग-अलग मामलों में आरोपी सामाजिक कार्यकर्ता सिविक चंद्रन ने कोझिकोड़ सेशन कोर्ट में अपनी ज़मानत याचिका दायर की थी, जिसपर जज एस कृष्णकुमार ने सुनवाई की थी. इनमें एक मामला 12 अगस्त का है, जब उन्होंने पीड़िता की जाति पर टिप्पणी करते हुए कह दिया था कि ‘यह जानते हुए कि पीड़िता अनुसूचित जाति से थी एक 73 वर्षीय शख्स उत्पीड़न कर ही नहीं सकता.’

पीड़िता के कपड़े पर उठाए सवाल

उससे पहले 2 अगस्त को एक अलग मामले की सुनवाई में जज ने पीड़िता के कपड़े पर टिप्पणी कर दी थी और कहा था कि ‘सबमिट की गई तस्वीर से पता चलता है कि पीड़िता ने उकसावे वाले कपड़े पहन रखे थे.’ इसके साथ ही उन्होंने कहा था ‘ऐसे में आईपीसी की धारा 354 के तहत यौन उत्पीड़न नहीं होगा.’ दोनों ही मामलों में जज ने आरोपी सिविक चंद्रन को ज़मानत दे दी थी.

आरोपी की जमानत पर हाई कोर्ट ने लगाई रोक

विवाद शुरू होने के बाद, केरल सरकार ने जमानत के आदेशों के खिलाफ हाई कोर्ट का रुख किया था. केरल सरकार ने अपनी दलील में फैसले को अवैध और त्रुटिपूर्ण बताया था. इसके बाद हाई कोर्ट ने आरोपी की ज़मानत पर रोक लगा दी थी और माना था कि “टिप्पणियों को उचित नहीं ठहराया जा सकता.” हालांकि कोर्ट ने आरोपी की उम्र को ध्यान में रखते हुए उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी और मामले की पूरी जानकारी के साथ एफिडेविट दायर करने का निर्देश दिया था.