छत्तीसगढ़

कोरोना के दौरान मास्क को लेकर पश्चिमी देशों की 6 बड़ी गलतियां

ऑक्सफोर्ड (ब्रिटेन)। मास्क कोविड-19 संक्रमण के लिए जिम्मेदार सार्स-कोव-2 वायरस के प्रसार को रोकने में मदद करते हैं, इसके बावजूद पश्चिम में मास्क पहनने को लेकर नीतियों में कुछ निर्णायक त्रुटियां दिखाई देती हैं। उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:-

1. एशिया की अनदेखी

शुरुआती अध्ययनों से पता चला है कि जिन देशों (ज्यादातर एशियाई) ने पहले मामले के सामने आने के 30 दिन के भीतर मास्क पहनना अनिवार्य कर दिया था, उनमें उन देशों (ज्यादातर पश्चिमी) की तुलना में कोविड-19 के मामले नाटकीय रूप से कम थे जिन्होंने मास्क पहनना अनिवार्य करने में 100 दिन से अधिक का समय लगाया। इस सिद्धांत को गंभीरता से लेने के बजाय कि मास्क लगाने से कोविड-19 से होने वाली मृत्यु दर को कम करने में योगदान दिया जा सकता है, पश्चिमी देशों ने कई कारणों से इसमें देरी की।

2. सही सबूत की प्रतीक्षा में

एशियाई देशों ने मास्क को प्रभावी मानकर एहतियातन इसे पहनने की अनिवार्यता को समझा जबकि पश्चिम के लोगों ने तर्क दिया कि मास्क पहनने के फायदे के अनिश्चित साक्ष्य होने के कारण इस संबंध में कुछ भी न करना सबसे ठीक रहेगा। ऐसी सावधानी नई दवाओं और टीकों के परीक्षण के लिए उपयुक्त है जिनके दुष्प्रभाव बीमारी से भी बदतर हो सकते हैं। लेकिन चेहरे पर थोड़ा-सा कपड़ा रखने का उतना जोखिम नहीं हो सकता है और इसमें देरी से भारी नुकसान हो सकता है।

3. अधिक नुकसान की आशंका

कुछ लोगों को डर था कि मास्क रोगवाहक के रूप में कार्य कर सकते हैं, क्योंकि लोग लगातार मास्क को छूते रहेंगे (जिसमें बाहर की तरफ संक्रमित बूंदें हो सकती हैं) और फिर उन्हीं हाथों से अपनी आंखों को छूते रहेंगे जिससे वे संक्रमित हो सकते हैं। हालांकि सबूतों से पता चलता है कि लोग दरअसल मास्क पहनते समय अपने चेहरे को उतना नहीं छूते जितना बिना मास्क के छूते हैं। इस बात के भी कोई सबूत नहीं हैं कि यदि आप मास्क पहनते हैं, तो आप खुद को सुरक्षित महसूस करेंगे और अधिक जोखिम लेंगे, ठीक वैसे ही जैसे एक ड्राइवर सीटबेल्ट पहनने के बाद लापरवाह हो जाता है।

4. यांत्रिक साक्ष्य का कम मूल्यांकन

एक जटिल प्रणाली में एक जटिल घटनाक्रम का आकलन करते समय हमें 2 प्रकार के साक्ष्य की आवश्यकता होती है- पहला यांत्रिक साक्ष्य जिसमें हम किसी विशेष कार्रवाई (जैसे मुखौटा पहनना) को एक विशेष परिणाम से जोड़ते हैं (जैसे कोविड-19 संक्रमण नहीं होना) और सांख्यिकीय साक्ष्य जिसकी मदद से इसके प्रभाव के आकार का अनुमान लगाया जाता है।

प्रयोगशालाओं में अक्सर यांत्रिक साक्ष्य उत्पन्न होते हैं। उदाहरण के लिए विभिन्न प्रकार के मास्क की फिल्टरेशन प्रभावकारिता का परीक्षण करने के लिए छींकने या कृत्रिम खांसी सिम्युलेटर का उपयोग किया जाता है। ये अध्ययन यह साबित नहीं करते हैं कि मास्क प्रभावी हैं, लेकिन वे महत्वपूर्ण तथ्य हैं जिन्हें खारिज नहीं किया जाना चाहिए था।

5. हवा के जरिए वायरस के फैलाव को नकारना

इस बात के व्यापक प्रमाण हैं कि हवा से फैलने वाला प्रसार, सार्स-कोव-2 के संचरण का मुख्य तरीका है, जो कम हवादार इनडोर स्थानों में सुपर स्प्रेडर घटनाओं के माध्यम से होता है। यह अपने आप में निर्णायक है। इसका मतलब है कि हमें निकट संपर्क से बचने की जरूरत है (वायुजनित प्रसार ज्यादातर 2 मीटर के भीतर होता है), लंबे समय तक घर के अंदर और भीड़ से। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने लंबे समय तक इस वायरस की हवा से फैलने की प्रकृति से इंकार किया। फिर भी मास्क की डिजाइन के लिए हवा के जरिए फैलाव मायने रखता है, क्योंकि इसका मतलब है कि हमें मास्क को चेहरे पर सही तरह से लगाने के संबंध में सावधानीपूर्वक ध्यान देने की आवश्यकता है (ताकि मास्क के दोनों तरफ ऐसा कोई स्थान न हो जिससे हवा गुजर सकती हो) और शायद उच्च श्रेणी के एफएफपी 2 मास्क लगाने पर विचार करें)।

6. समय से पहले मास्क की अनिवार्यता को समाप्त करना

ब्रिटेन सरकार की यह घोषणा कि 19 जुलाई से सार्वजनिक स्थानों पर मास्क अनिवार्य नहीं रहेगा, समयानुकूल नहीं है। कोविड-19 के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं और जहां टीकाकरण ने अस्पताल में भर्ती होने और मृत्यु की आशंकाओं को कम कर दिया है, वहीं यह संख्या भी बढ़ रही है। यदि इन तमाम जोखिमों के बावजूद राजनेता समाज को ‘खोलने’ के इच्छुक हैं तो अनिवार्य रूप से मास्क लगाने का नियम जारी रखना ऐसा अधिक सुरक्षित रूप से करने का एक तरीका हो सकता है।